Thursday, February 22, 2024
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कर्बला में सबसे नन्हें शहीद 6 माह के अली असगर

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दुल्हीपुर – मोहर्रम के जूलूस में ले जाते ताजिया

चंदौली। 2 मुहर्रम 61 हिजरी 10 अक्टूबर 680 में कर्बला में इमाम हुसैन के काफिले को याजीदी फौज ने घेर लिया तो इमाम हुसैन ने वही अपने साथियों से खेमा लगाने को कहा। पास बहने वाली फुरात नदी के पानी पर भी याजीदी फौज ने पहरा लगा दिया। बिना पानी के इमाम हुसैन के साथियों और परिवार का बुरा हाल हो गया। इमाम हुसैन के 6 माह के बेटा अली असग़र भी उनके साथ थे। बड़ों ने तो खुद की भूख-प्यास पर काबू कर लिया लेकिन छोटे से बच्चे की हालत देखकर इमाम हुसैन की पत्नी सय्यदा रबाब ने कहा कि “इस बच्चे की तो किसी से कोई दुश्मनी नहीं है, शायद इसे पानी मिल जाए।”
उनकी की बात मानकर इमाम हुसैन बच्चे को लेकर अपने खेमें से बाहर निकले और याजीदी फौज से कहा कि “कम से कम इसे तो पानी पिला दो।” जवाब में यजीद के फौजी हरमला ने ऐसा तीर मारा कि वह हज़रत अली असग़र के हलक को चीरता हुआ इमाम हुसैन के बाज़ू में जा लगा। बच्चे ने बाप के हाथ पर तड़प कर अपनी जान दे दी। इमाम हुसैन के काफिले का यह सबसे नन्हें शहीद थे।#कर्बला दुनिया का वह पहला आंदोलन था जिसे ईमाम हुसैन की बहन बीबी #ज़ैनब ने संभाला था जिन्होंने #मदीना पहुँचते-पहुचँते सारी अवाम के दिल में #हुसैन की शहादत की आग दहका दी थी।
कर्बला और यह मोहर्रम हमे हमेशा याद दिलाएगा की ज़ुल्मी चाहे जितना बड़ा हो,चाहे जितना खूँखार हो और हम चाहे जितने कम हों,अगर ईमानदारी से उसके खिलाफ हैं तो उसका नेस्तनाबूद होना तय है। माह ए मोहर्रम के दस रोज़ हो सके तो करीब से देखना। इन दस दिनों के इतिहास को झाँक कर देखिये,बहुत कुछ मिलेगा। ज़िन्दगी का पूरा फ़लसफ़ा इसी में गुँथा हुआ है।
छः महीने के बच्चे से ज़ईफ़ (बूढ़े-बुजुर्ग) तक की शहादत में इस्तेमाल हुई राजनीति और कूटनीति कितना कुछ समेटे है।
मीर,दबीर सब तो इन दस दिनों को लिख चुके हैं, जिन्हें सुन-सुन कर हर हस्सास दिल रो दे,मगर मेरा मानना है की इन दस दिनों को अपनी ज़िन्दगी का सबक बना लो।
सच के लिए क़ुर्बानी इतिहास में भरी पड़ी है, मगर ये एक ऐसा पन्ना है जहाँ रब के बताये सच्चे रास्ते में पूरा का पूरा परिवार लड़ जाए और उस लड़ाई में सबसे ज़्यादा शहादत के बावजूद तारीख़ में हमेशा हमेशा के लिए ज़िंदा हो जाए।
मैं ये नही कहता की करबला को तुम सिर्फ मुसलमानो की नज़र से देखो।।इसे बहुत दूर से अपने खुद के दिल पर अपना काबू पाकर देखो की कैसे 72 लोग हज़ारों के लश्कर पर भारी पड़ गए। यह सब शहीद हुए मगर दूर कर्बला के रेगिस्तान से इनकी शहादत कैसे हमारे हरे भरे बागो, मैदानों, पहाड़ों तक जा पहुँची।
सच पूछो तो यह एक आंदोलन था। इमाम हुसैन का आंदोलन,सत्य के लिए असत्य के विरुद्ध एक आंदोलन।
कर्बला की याद रुलाती है, ज़ार-ज़ार रुलाती है मगर कर्बला सबक भी देती है। जब #इस्लामी दुनिया पर एक यजीद नामक ग्रहण लगा तब कूफा (ईराक) के लोगों ने #हज़रते #हुसैन से गुहार लगाई, डेढ़ सौ ख़त लिख कर तरह तरह से निवेदन (अनुरोध) किया कि आप आइए हमारा नेतृत्व कीजिए हमें यजीद के ज़ुल्म से बचाइए, आप #नबी के नवासे हैं अगर आप भी हमारा साथ नहीं देंगे तो कौन देगा। मायूस होकर ये भी कहते हैं कि अगर इस ज़ुल्म के ख़िलाफ आज आपने हमारा साथ नहीं दिया तो रोज़े महशर (डे ऑफ जजमेंट) हम ख़ुदा के सामने आपका दामन पकड़ लेंगे।इसके बाद जब हज़रते हुसैन अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ, कुछ ख़ास रिश्तेदारों के साथ कूफा के लिए निकलते हैं तो शहर में दाखिल होने से पहले कर्बला नामक रेतीले मैदान में यजीदी फौज उन्हें रोक लेती है। न सिर्फ रोक लेती है बल्कि चारों तरफ से घेर लेती है, उन पर हर तरफ से पहरे लगा देती है यहाँ तक कि बग़ल से बह रही फरात नदी का पानी भी रोक देती है ।
हज़रते हुसैन और उनके बीवी बच्चे जिनमें कुछ बीमार भी थे वे पानी की एक एक बूंद को तरस जाते हैं पर यजीदी फौज को उन पर रहम नहीं आता।
हुसैन हक़ पर थे, वे जुल्म के ख़िलाफ कूफियों के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे थे। सच पूछो तो यह एक आंदोलन था। इमाम हुसैन का आंदोलन, सत्य के लिए असत्य के विरुद्ध एक आंदोलन। सच के लिए क़ुर्बानी इतिहास में भरी पड़ी है, मगर ये एक ऐसा पन्ना है जहाँ अल्लाह के बताये सच्चे रास्ते में पूरा का पूरा परिवार लड़ जाए और उस लड़ाई में सबसे ज़्यादा शहादत के बावजूद तारीख़ में हमेशा हमेशा के लिए ज़िंदा हो जाए। इस तरह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम कर्बला के मैदान अपने साथियों अपने परिवार के साथ शहादत दे कर इसलाम का सर बुलन्द कर गए। हजरत इमाम हुसैन एवं उनके साथियों की शहादत इंसाफ, अहिंसा एवं इंसानियत का पैगाम देती है एक पल की थी ।

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